लाखों में एक ही स्ट्रगलर से एक्टर बन पाता है – चंद्रशेखर दत्ता

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Chandra Shekhar Dutta (L) in ‘Laakhon Mein Ek’

“स्ट्रगलर होने के लिए कोई बैकग्राउंड या नेपोटिजम काम नहीं करता। ये वैसा ही है कि आप चाह रहे हो कि अचानक चीजें बन जाये और आपकी जद्दोजहद खत्म हो जाये। स्टार किड्स भी कही न कही रिस ही रहे हैं।कोई किसी और जॉब में उलझ कर फंसा हुआ है और वो एक्टिंग करना चाहता है। क्लिक हो जाना चाहता है और चाहता है कि उसकी गाड़ी चल निकले जैसे सैटेलाइट एक बार ऑर्बिट में आ गयी तो घूमती रहेगी, मगर ऐसा कब हुआ था कि सबके दौर एक साथ हो। मेरे प्रिय गोविंदा जी भी स्ट्रगल ही कर रहे हैं। कई अच्छी शक्ल और ख़ास परिवार से आने वाले भी स्ट्रगलर ही है। इसे किसी काम वाले ट्रैंड प्रयासरत अभिनेता से जोड़ना असहज लगता हैं क्योंकि वो रिस नही घिस रहा है।कला के प्रति समर्पित होने की तैयारी कर ली है।उसका कलाकार शब्द उसके साथ वजन देता है।” यह कहना है ‘लाखों में एक’ वेब सीरीज़ के अभिनेता चन्द्रशेखर दत्ता का।

दत्ता फ़िल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट पुणे से अभिनय में प्रशिक्षित है । मुंबई में रहकर अपनी पहचान बनाने के लिये संघर्षरत युवाओं के बारे में बात करते हुए वो आगे कहते हैं।

“स्ट्रगल शब्द मैंने अक्सर सुना उन कास्टिंग असिस्टेंट के मुँह से जो कहते हैं कि वो मुझे कास्ट कर लेंगे यह तो ठीक है पर एक एक्टर के तौर पर वो खुद कुछ कर पाएंगे यह उनका ईश्वर जाने और नियति भी। टिकने के लिये जॉब सबसे अच्छा है मगर वो दो प्रॉबलम्स देती है। एक तो आपका बॉयोडाटा बढ़ा देती है, दूसरा जबरदस्ती की रेस्पेक्ट जो हम्बल नहीं रहने देती। आप का अमाउंट ऑफ फूटेज तो बढ़ जाता है पर आप शो या सीन पुल नहीं कर पाते। आपके केमिकल एलिमेंट्स जर्मीनेट नहीं होते और आप रंग, उमंग, रस नहीं भर पाते, सूक्ष्म नाश्ता होता है। स्ट्रगल मतलब घिसना और रिसना ज़रूरी है। वो दर्द क्राफ्ट को मैजिकल बनाता है नहीं तो क्वांटिटी तो रद्दी का ढेर भी होता है। एक्टिंग का दरअसल कोई शॉर्टकट नहीं है इसलिये कोई एक ही लाखों में टिकता है और अभिनेता बनता है जैसे इरफान, मनोज बाजपेयी और मिथुन दा।”

 

आईना और आप

“कोशिश यही रहती है कि जैसे व्यक्ति खुद के लिए आईने में जगह ढूंढता है वही आईना खुद के लिए रखें और साफ रखें। मेकअप दादा ही एक्टर को आइना दिखाते हैं।अब एक एक्टर दूसरे एक्टर को दिखायेगा तब दोंनो ही जगह पर नहीं है। एक दूसरे को साथ देकर आगे बढ़ सकते हैं। सैडिस्ट होना आसान है पर कठिन है अभिनेता बनना क्योंकि उसे संवेदनशील होना होता है, उद्वेलित होना होता है। सच्ची आस्था रखनी पड़ती है। यह अगर एक अंश भी आना शुरू हुआ तो सिस्टम में करप्शन एंटर कर गया समझिए।”

आपको महसूस नहीं होता कि अनडिजर्विंग लोग वो कर रहे हैं जिसके लिए आप तड़प रहें हैं और ड्रीम देखते हैं?

ऐसा नहीं होता, मैं जो चाह रहा हूँ वो किसी और को भी मिल सकता है। मगर मैं विशिष्ट तभी हूँ जब मेरी चाहत भी विशिष्ट हो। बेसिक रिक्वायरमेंट की ऐसा करना है, हीरो बनना है, डांस, फाइट, एक्शन, ड्रामा, बेड सीन, प्लेबैक आदि ये सब ठीक है पर वो सचमुच टटोलना होगा डीप डाउन जाकर कि वाकई मैं यह चाहता हूँ अपनी सुषुप्त अवस्था में। अगर हाँ तो वो आएगी। मैंने अगर कैटलिस्ट से कर भी लिया तो लॉंगविटी नहीं होगी या मीनिंगफुल नहीं होगी। एक हीरो के हज़ारों चेहरे होते हैं उसी को रच गढ़ पाऊं बस ज्यादा उम्मीदें ठीक नहीं। प्रैक्टिस में रहना जरूरी है।पहले कला फिर स्किल्स । कोई अच्छा फाइट करता है, स्टंट करता है पर एक्टिंग जीरो। इससे बेहतर तो यह कहलाना है कि अच्छा एक्टर है बस थोड़ी सी मेहनत से हम इस से फाइट सीन करवा सकते है। डांस के लिये 20 दिन का वर्कशॉप करा देंगे। ये बहुत बारीक़ खेल है। टिके रहते हुए करना पड़ता है। जिस सेट पर ये बात चले कि एक्टिंग तो हम करवा लेंगे उस जगह जा कर तिरस्कृत होने की जरूरत नहीं है क्योंकि अभिनय संवेदनाओं का खेल है।आपके स्वाभिमान का योगदान होता है।”

चंद्रशेखर दत्ता एक दृष्टि और जीवन रखते हैं। ‘लाखों में एक’ में गन्धर्व छाप छोड़ता है वैसे ही जैसे इनकी सोच। लाखों में एक अभिनेता, एक विचार।

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